जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ती भीड़ और पुलिस पर हमला: विरोध के अधिकार की आड़ में हिंसा क्यों स्वीकार्य नहीं

जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ती भीड़ और पुलिस पर हमला: विरोध के अधिकार की आड़ में हिंसा क्यों स्वीकार्य नहीं

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाना, परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के विरुद्ध आवाज़ उठाना और अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। किंतु लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी अनिवार्य रूप से जुड़े होते हैं। जब कोई प्रदर्शन निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन करते हुए हिंसक भीड़ में परिवर्तित हो जाए, पुलिस बैरिकेड तोड़े जाएं, पत्थर एवं अन्य वस्तुओं से पुलिसकर्मियों पर हमला किया जाए तथा प्रदर्शनकारी संसद की सुरक्षा व्यवस्था की ओर अग्रसर होने का प्रयास करें, तब यह स्थिति केवल “प्रदर्शन” की नहीं रहती—यह कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाती है।

20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर प्रस्तावित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान ऐसी ही गंभीर स्थिति उत्पन्न हुई। दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास किया तथा पुलिस एवं केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवानों पर पत्थरों एवं अन्य वस्तुओं से हमला किया। पुलिस के अनुसार इस हिंसा में 118 से अधिक पुलिस एवं केंद्रीय सशस्त्र पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

यह आंकड़ा स्वयं इस बात का संकेत देता है कि स्थिति कितनी गंभीर हो गई थी। घायलों में पुलिस के अति वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल बताए गए। इस हिंसक झड़प में महिला पुलिसकर्मी भी घायल हुईं।

जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल है, संसद की सुरक्षा रेखा नहीं

प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल और संवेदनशील संवैधानिक संस्थानों की सुरक्षा—इन दोनों के बीच स्पष्ट अंतर को समझना आवश्यक है। जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना एक विषय है, जबकि वहां से भीड़ का संसद की ओर बढ़ना और सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास करना पूर्णतः भिन्न परिस्थिति है।

संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाओं में से एक है। इसकी सुरक्षा व्यवस्था केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्थान की सुरक्षा का अनिवार्य एवं संवेदनशील दायित्व है। ऐसे में जब प्रदर्शनकारी संसद की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो पुलिस के समक्ष केवल भीड़ नियंत्रण की चुनौती नहीं होती; बल्कि संवैधानिक संस्थाओं, आम नागरिकों, सांसदों, कर्मचारियों तथा राजधानी की समग्र सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी होती है।

इसी कारण पुलिस द्वारा संसद की ओर जाने वाले मार्ग पर बैरिकेड लगाना, मानव श्रृंखला बनाना तथा प्रदर्शनकारियों से आगे न बढ़ने की अपील करना कानून-व्यवस्था की सामान्य एवं आवश्यक प्रक्रिया का हिस्सा था। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इसके बावजूद भीड़ के कुछ हिस्सों ने अवरोधों को पार करने का प्रयास किया तथा पत्थर एवं पानी की बोतलें फेंकी गईं।

जब बैरिकेड टूटते हैं, तो मामला केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं रहता

लोकतांत्रिक विरोध की पहचान शांतिपूर्ण नारे, भाषण, पोस्टर और अनुशासित मार्च से होती है। किंतु बैरिकेड तोड़ना, पुलिसकर्मियों को घेरना, पत्थरबाजी करना तथा ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों पर हमला करना किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन की श्रेणी में नहीं आता।

20 जुलाई की हिंसा के पश्चात दिल्ली पुलिस ने कई FIR दर्ज कीं, जिनमें दंगा, लोकसेवकों पर हमला तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। एक FIR में संसद की सुरक्षा व्यवस्था को भंग करने के प्रयास तथा पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोप भी दर्ज किए गए।

इस संदर्भ में मूल प्रश्न यह नहीं है कि प्रदर्शनकारी किस मांग को लेकर एकत्र हुए थे। मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी भी वैध मांग को लेकर पुलिसकर्मी पर हमला करना स्वीकार्य हो सकता है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक है।

घायल पुलिसकर्मी केवल वर्दीधारी नहीं, परिवारों के सदस्य भी हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का एक मानवीय पक्ष भी है, जिसे सार्वजनिक विमर्श में अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

जंतर-मंतर की हिंसा में घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों ने बताया कि कई अधिकारियों को पत्थरों, जूते-चप्पलों एवं अन्य वस्तुओं से निशाना बनाया गया। उनके अनुसार कुछ अधिकारियों के हेलमेट तक क्षतिग्रस्त हो गए तथा कई को गंभीर चोटें आईं।

सब-इंस्पेक्टर श्रीनिवास शर्मा उन पुलिसकर्मियों में शामिल बताए गए जिन्हें प्रदर्शन के दौरान चोट लगी। रिपोर्ट के अनुसार बैरिकेड से चोट लगने के बाद उनके पैर में फ्रैक्चर हुआ तथा बाद में भीड़ द्वारा कथित रूप से खींचकर उन पर हमला किया गया।

बाद के घटनाक्रम में एसीपी विवेक भगत को पत्थरबाजी में चोट लगी। राम मनोहर लोहिया अस्पताल के अनुसार उनके शरीर के कई हिस्सों में चोट एवं सूजन थी तथा सिर के पिछले हिस्से में भी चोट पाई गई।

इसी घटनाक्रम में एसीपी जय प्रकाश भी घायल हुए। उनके अनुसार जब कुछ प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने लगे, तो पुलिस ने बैरिकेड एवं मानव श्रृंखला बनाकर उन्हें रोकने का प्रयास किया। इसके पश्चात कथित रूप से पत्थरबाजी हुई, जिसमें एक पत्थर उनके माथे पर लगा और उन्हें फ्रैक्चर जैसी चोट आई।

इसके अतिरिक्त, 25 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुई एक अन्य झड़प में विशेष पुलिस कमिश्नर अनिल शुक्ला सहित अन्य अधिकारी भी पत्थरबाजी में घायल हुए।

ये नाम केवल आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे परिवार हैं—माता-पिता, जीवनसाथी और बच्चे—जो प्रतिदिन इस आशंका के साथ प्रतीक्षा करते हैं कि उनका परिजन सुरक्षित लौटेगा या नहीं।

वर्दी के पीछे भी एक इंसान होता है।
ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी विरोध का लक्ष्य नहीं, बल्कि कानून के संरक्षक होते हैं।

पुलिस पर हमला और पुलिस कार्रवाई—दोनों का पृथक मूल्यांकन आवश्यक है।

इस घटनाक्रम पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। पुलिस कार्रवाई की समीक्षा और पुलिसकर्मियों पर हुए हमले की आलोचना—दोनों अलग-अलग विषय हैं और इन्हें एक-दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए।

यदि किसी पुलिस कार्रवाई में आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग हुआ हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई की जांच हेतु एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की दिशा में कदम उठाया है, जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच का प्रावधान बताया गया है।

किन्तु इसके साथ ही यह प्रश्न भी उतनी ही गंभीरता से उठना चाहिए कि पुलिस एवं सुरक्षा बलों पर हमले के लिए उत्तरदायित्व किसका निर्धारित होगा?

न्याय केवल प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा तक सीमित नहीं है; यह पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करता है।

पुलिस का संयम कमजोरी नहीं, बल्कि पेशेवर आचरण है

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह कहा है कि उसने अधिकतम संयम का पालन किया तथा स्थिति नियंत्रण हेतु न्यूनतम आवश्यक बल का ही प्रयोग किया। पुलिस का यह भी कहना है कि प्रदर्शन में असामाजिक तत्वों एवं आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की उपस्थिति के कारण स्थिति बिगड़ी और 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए।

यह पुलिस का पक्ष है और इसकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। तथापि, एक व्यापक सिद्धांत अपरिवर्तित रहता है—भीड़ का हिंसक होना कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

लोकतंत्र में पुलिस से संयम की अपेक्षा की जाती है, किंतु संयम का अर्थ यह नहीं कि पुलिसकर्मी स्वयं पर हो रहे हमलों को निष्क्रिय रूप से सहन करें या संवेदनशील संस्थानों की सुरक्षा को जोखिम में पड़ने दें।

“ प्रश्न करना अधिकार है, कानून का उल्लंघन नहीं”

प्रदर्शनकारी सरकार से प्रश्न कर सकते हैं, नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, जांच की मांग कर सकते हैं और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज करा सकते हैं। किंतु इन अधिकारों की वैधता उन्हें कानून से ऊपर नहीं रखती।

इसी प्रकार, पुलिस को भी कानून के दायरे में रहकर कार्य करना होता है। परंतु पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी, उन्हें घेरना, उनके सुरक्षा उपकरणों को क्षति पहुंचाना या उन्हें शारीरिक रूप से निशाना बनाना किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन का स्वीकार्य हिस्सा नहीं हो सकता।

विरोध की स्वतंत्रता का अर्थ हिंसा की स्वतंत्रता नहीं है।

संसद की ओर बढ़ने का प्रयास क्यों गंभीर था?

संसद की सुरक्षा किसी सामान्य सरकारी भवन जैसी नहीं होती। यह देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, जहां राष्ट्रीय महत्व के निर्णय लिए जाते हैं। इसलिए संसद की ओर किसी भी अनधिकृत भीड़ के बढ़ने की स्थिति को सुरक्षा एजेंसियां सामान्य प्रदर्शन के रूप में नहीं देख सकतीं।

जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ने के प्रयास के दौरान पुलिस द्वारा बैरिकेड लगाना और भीड़ को रोकने का प्रयास इसी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा था। ACP जय प्रकाश के अनुसार कुछ प्रदर्शनकारी Parliament Street की ओर बढ़ने लगे थे, जिन्हें रोकने के लिए बैरिकेड एवं मानव श्रृंखला बनाई गई थी।

यदि उस समय सुरक्षा बल पीछे हट जाते और भीड़ संसद के सुरक्षा घेरे तक पहुंच जाती, तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती थी। इसलिए राजधानी की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन का न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक दायित्व भी है।

लोकतंत्र में अधिकार के साथ अनुशासन भी अनिवार्य है।

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि हम किस प्रकार के लोकतंत्र की कल्पना करते हैं—ऐसा लोकतंत्र जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो, या ऐसा वातावरण जहां भीड़ की शक्ति कानून से ऊपर हो जाए।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, पुलिस कार्रवाई पर प्रश्न उठना चाहिए और निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए। किंतु पुलिस पर हमले को “आंदोलन” के रूप में वैध ठहराना उतना ही खतरनाक है जितना शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की अनदेखी करना।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति भीड़ में नहीं, बल्कि कानून के प्रति सम्मान में निहित होती है।

जंतर-मंतर की घटना यह स्पष्ट करती है कि प्रदर्शन और अराजकता के बीच एक स्पष्ट सीमा रेखा होती है। जब तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहता है, वह लोकतंत्र की अभिव्यक्ति है। किंतु जब पत्थरबाजी होती है, बैरिकेड टूटते हैं, पुलिसकर्मी घायल होते हैं और संवैधानिक संस्थाओं की सुरक्षा को चुनौती मिलती है, तब राज्य का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।

अंततः संदेश स्पष्ट होना चाहिए—

“असहमति लोकतंत्र का आधार है, किंतु हिंसा लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हो सकती।”

“सरकार से प्रश्न करें, पुलिस से संघर्ष नहीं; अधिकारों की मांग करें, कानून का उल्लंघन नहीं।”

“प्रदर्शन का अधिकार संविधान प्रदत्त है, किंतु हिंसा का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं है।”

जंतर-मंतर की घटना को इसी संतुलित दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए—जहां शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकार सुरक्षित रहें, पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा हो, और साथ ही पुलिस एवं सुरक्षा बलों पर हमले करने वालों की विधिसम्मत जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए।

क्योंकि कानून का शासन तभी सुदृढ़ होता है जब अधिकार और उत्तरदायित्व—दोनों का समान रूप से पालन हो।


लेखक–राजीव गुप्ता निवाड़ी
संस्थापक–निवाड़ी न्यूज डिजिटल न्यूज पोर्टल।