गढ़कुंडार की ऐतिहासिक धरोहर: एक हजार साल पुराना मां गिद्ध वाहिनी का मंदिर, नवरात्रि में उमड़ते हैं श्रद्धालु

गढ़कुंडार की ऐतिहासिक धरोहर: एक हजार साल पुराना मां गिद्ध वाहिनी का मंदिर, नवरात्रि में उमड़ते हैं श्रद्धालु
सिंदूर सागर तालाब के किनारे विराजमान हैं मां गिद्ध वाहिनी, बुंदेला राजवंश की कुलदेवी के रूप में होती है पूजा-अर्चना; खंगार क्षत्रिय समाज की कुलदेवी मां गजानन का मंदिर भी है आस्था का प्रमुख केंद्र

निवाड़ी। बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरती अपने शौर्य, पराक्रम और समृद्ध धार्मिक परंपराओं के लिए देशभर में पहचान रखती है। इसी ऐतिहासिक विरासत को अपने भीतर समेटे निवाड़ी जिले का गढ़कुंडार गांव प्राचीन मंदिरों और धार्मिक मान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है। यहां सिंदूर सागर तालाब के किनारे स्थित मां गिद्ध वाहिनी का प्राचीन मंदिर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि इस मंदिर का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। नवरात्रि के दौरान यहां दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना के साथ मेले का आयोजन भी किया जाता है।
गढ़कुंडार का संबंध खंगार क्षत्रिय समाज और बुंदेला राजवंश के इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। गांव में स्थित मां गिद्ध वाहिनी मंदिर को बुंदेला राजवंश की कुलदेवी से संबंधित धार्मिक स्थल माना जाता है, जबकि मां गजानन का मंदिर खंगार क्षत्रिय समाज की कुलदेवी के रूप में पूजित है। दोनों मंदिर क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपराओं और लोक आस्था के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है मंदिर का इतिहास
सिंदूर सागर तालाब के किनारे स्थित मां गिद्ध वाहिनी मंदिर को लेकर क्षेत्र में अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर के इतिहास का उल्लेख साहित्यकार वृंदावनलाल वर्मा की लेखनी में भी मिलने की बात कही जाती है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा के नीचे लगे शिलालेख को भी इसके प्राचीन इतिहास से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है और इसकी स्थापना संवत 1126 में कराई गई थी।
मां गिद्ध वाहिनी को मां विंध्यवासिनी का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता विंध्याचल पर्वत से गिद्ध पर सवार होकर निकली थीं और जिस स्थान पर गिद्ध ने विश्राम किया, उसी स्थान पर मंदिर निर्माण कराने का निर्देश दिया गया था। मान्यता है कि गिद्ध गढ़कुंडार में सिंदूर सागर तालाब के समीप स्थित पहाड़ी पर आकर बैठा था। इसके बाद यहां मां गिद्ध वाहिनी का मंदिर स्थापित किया गया।
यह मान्यता मंदिर को बुंदेलखंड के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान प्रदान करती है। आज भी श्रद्धालु इस स्थान पर पहुंचकर माता के दर्शन करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
सोहनपाल बुंदेला की उपासना से जुड़ी है मंदिर स्थापना की कथा
मां गिद्ध वाहिनी मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक प्रचलित कथा बुंदेला शासक सोहनपाल बुंदेला और खंगार शासक नागपाल के समय की बताई जाती है।
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, खंगार राज्य के पांचवें शासक नागपाल ने सोहनपाल बुंदेला की पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखा था, जिसे सोहनपाल ने अस्वीकार कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद दोनों पक्षों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। युद्ध में विजय प्राप्त करने की कामना से सोहनपाल बुंदेला ने विंध्याचल पर्वत पर जाकर मां विंध्यवासिनी की कठोर उपासना की।
कथा के अनुसार, लंबे समय तक पूजा करने के बाद भी जब माता के दर्शन नहीं हुए, तब सोहनपाल ने अपना शीश माता के चरणों में अर्पित करने का संकल्प लिया। इसी दौरान माता प्रकट हुईं और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि माता ने सोहनपाल से कहा कि वे गिद्ध पर सवार होकर विंध्याचल से प्रस्थान करेंगी और जिस स्थान पर गिद्ध ठहरेगा, वहीं उनके मंदिर का निर्माण कराया जाए।
इसके बाद माता का गिद्ध गढ़कुंडार में आकर ठहरा। सोहनपाल बुंदेला ने यहां मंदिर का निर्माण कराया और इसके बाद हुए युद्ध में विजय प्राप्त की। इसी कथा के आधार पर मां गिद्ध वाहिनी मंदिर को बुंदेला राजवंश के इतिहास और धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है।
श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं से जुड़ी हैं अनेक मान्यताएं
मां गिद्ध वाहिनी और मां गजानन के मंदिरों को लेकर क्षेत्र में अनेक लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से माता की आराधना करने पर उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही विश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को इन मंदिरों से जोड़ता आया है।
मंदिर से जुड़ी एक घटना वर्ष 2005 की बताई जाती है। स्थानीय स्तर पर प्रचलित विवरण के अनुसार, राजस्थान में पदस्थ रहे अनुविभागीय अधिकारी मदनलाल बागड़बतिया को संतान प्राप्ति नहीं होने पर माता के दर्शन करने का स्वप्न आया था। इसके बाद वे अपने परिवार के साथ गढ़कुंडार स्थित मां गिद्ध वाहिनी मंदिर पहुंचे और पूजा-अर्चना की। मान्यता के अनुसार, बाद में उनके परिवार में संतान का जन्म हुआ। इसके बाद उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार में सहयोग किया।
मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रचलित कथा दान पेटी से चोरी की घटना की है। स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित इस कथा के अनुसार, दान पेटी से चोरी करने वाले एक व्यक्ति का हाथ उसमें फंस गया था। इन कथाओं को श्रद्धालु माता की शक्ति और मंदिर की महिमा से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इन घटनाओं को स्थानीय मान्यताओं और जनश्रुतियों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
नवरात्रि में विशेष पूजा-अर्चना, लगता है मेला
नवरात्रि का पर्व मां गिद्ध वाहिनी मंदिर में विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इन दिनों मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। बुंदेलखंड के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी लोग माता के दर्शन करने आते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धार्मिक आयोजन होते हैं। इस अवसर पर मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
मंदिर में भगवान श्रीरामराजा सरकार के ओरछा स्थित मंदिर की परंपरा से प्रेरित होकर राजभोग की व्यवस्था भी शुरू किए जाने की जानकारी दी जाती है। इसके अंतर्गत प्रतिदिन माता को राजभोग अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।
मंदिर में सुबह, दोपहर और शाम को आरती की जाती है। मंदिर के निर्धारित समय के अनुसार, सुबह सात बजे पट खुलते हैं। दोपहर 12 बजे से दो बजे तक मंदिर बंद रहता है। इसके बाद दोपहर दो बजे से शाम साढ़े सात बजे तक श्रद्धालु माता के दर्शन कर सकते हैं।
विंध्याचल से जुड़ी है पुजारी परिवार की परंपरा
मां गिद्ध वाहिनी मंदिर की धार्मिक परंपराओं में यहां पूजा-अर्चना करने वाले बबेले परिवार का भी विशेष स्थान बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस परिवार के पूर्वज विंध्याचल से गढ़कुंडार आए थे और उन्होंने मां गिद्ध वाहिनी की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभाली थी। इसके बाद से परिवार की पीढ़ियां मंदिर में पूजा-पाठ की परंपरा को आगे बढ़ाती रही हैं।
मंदिर के आसपास लगभग 500 बीघा भूमि होने की जानकारी भी स्थानीय स्तर पर दी जाती है। मंदिर की प्राचीनता, धार्मिक मान्यताओं और पुजारी परिवार की परंपरा के कारण इसका महत्व केवल एक पूजा स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है।
धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक पहचान भी है गढ़कुंडार
गढ़कुंडार अपनी ऐतिहासिक पहचान, प्राचीन दुर्ग और धार्मिक स्थलों के कारण बुंदेलखंड की विरासत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां स्थित मां गिद्ध वाहिनी और मां गजानन के मंदिर क्षेत्र की लोकपरंपराओं, ऐतिहासिक स्मृतियों और धार्मिक विश्वासों को संजोए हुए हैं।
नवरात्रि के अवसर पर इन मंदिरों में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन धार्मिक स्थल आज भी लोगों की आस्था से गहराई से जुड़े हैं। ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी गढ़कुंडार का विशेष महत्व है। इन मंदिरों का संरक्षण और इनके इतिहास का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।